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हेडलाइन

जशपुर की माटी से पढ़ लिख कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दुस्तान की शान बढ़ाने में जुटे भारतीय सेना के मेजर अल्तमस सिद्दीकी

जशपुर नगर 18 दिसंबर ( रमेश शर्मा)
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले की माटी से पढ़ लिख कर हिन्दुस्तान की शान बढ़ाने में जुटे भारतीय सेना के मेजर अल्तमस सिद्दीकी इस वक्त संयुक्त राष्ट्र का एक शांति मिशन की अगुवाई कर रहे है,
जशपुर जिले में सभी वर्ग के लोगों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले समाजसेवी खालिद सिद्दीकी और श्रीमती शंमा सिद्दीकी का कहना है उनके बेटे मेजर अल्तमस की सफलताओं पर पूरे जिले वासियों को हमेशा गर्व होता है।

    खालिद सिद्दीकी ने मेजर अल्तमस सिद्दीकी से बातचीत का अनुभव साझा करते हुए बताया कि यह अंतराष्ट्रीय मिशन 1978 में इज़रायल और लेबनान के बीच शांति और सुरक्षा बहाल करने के लिए स्थापित किया गया था। यंहा UNIFIL में लगभग 50 देशों के 10,000 से अधिक शांति सैनिक हैं। वे चौबीस घंटे लेबनान के दक्षिण में ‘ब्लू लाइन’ (इज़रायल और लेबनान के बीच की सीमा रेखा) के साथ गश्त और निगरानी करते हैं।
  यंहा पर भारत UNIFIL में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता है, जिसमें लगभग 900 सैनिक शामिल हैं, जो ‘ब्लू लाइन’ (इजरायल-लेबनान सीमा) के पास पूर्वी सेक्टर में तैनात हैं, जहाँ वे गश्त करते हैं, तनाव कम करते हैं और लेबनान सरकार को क्षेत्र में नियंत्रण स्थापित करने में मदद करते हैं।
इसी अभियान में मेजर अल्तमश सिद्दीकी UNIFIL मुख्यालय में स्टाफ ऑफिसर लॉजिस्टिक्स प्लानिंग के पद पर तैनात हैं।

मेजर अल्तमस का कहना है कि उन्हें सात समंदर पार रह कर अपनी चुनौतियां की रंचमात्र भी परवाह नहीं है, इसके विपरित भारतीय सैनिकों के साथ काम करने में गर्व महसूस होता है।
  दरअसल यह क्षेत्र गोलन हाइट्स के पास है और अत्यधिक संवेदनशील माना जाता है। यंहा पर मुख्य चुनौती दुर्गम और ऊबड़-खाबड़ इलाका में गश्त के दौरान सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्र की दुर्गम भौगोलिक स्थिति है। पूर्वी सेक्टर में पहाड़ी, ऊबड़-खाबड़ और अलग-थलग इलाके हैं, जहां यूनिफिल के ऑब्जर्वेशन पोस्ट्स स्थित हैं। इन क्षेत्रों में पैदल या वाहनों से गश्त करना बेहद कठिन होता है, क्योंकि रास्ते संकरे, बेहद खतरनाक और मौसम की मार झेलने वाले होते हैं।
    भारतीय शांतिरक्षक इन अलग-थलग पोस्ट्स पर तैनात रहते हैं, जो लॉजिस्टिक्स और मूवमेंट को चुनौतीपूर्ण बनाता है। यंहा अन्य प्रमुख चुनौतियों में हर वक्त संघर्ष का खतरा बना रहता है। इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच तनाव के कारण क्रॉस-बॉर्डर फायरिंग, रॉकेट हमले या एयरस्ट्राइक का खतरा रहता है, जिससे गश्त सीमित हो जाती है और जवानों को बंकरों में रहना पड़ता है।
यंहा लैंडमाइंस और अवशेष दक्षिणी लेबनान में पुराने युद्धों से बचे माइंस और अनएक्सप्लोडेड ऑर्डनेंस की सफाई भी एक चुनौती है, हालांकि हाल ही में डिमाइनिंग फिर शुरू हुई है।
स्थानीय समुदायों से सहयोग लेना ही कभी-कभी स्थानीय लोगों से टकराव या गश्त में बाधा आती है।

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