चार्लोट नॉर्थ कैरोलिना 27 अगस्त
महाराष्ट्र की तरह अमेरिका में भी गणेश चतुर्थी 2025 की जगह जगह धूम दिखाई दे रही है। अमेरिका में रहने वाले भारतीय यहां भगवान गणेश के जन्मोत्सव को नाच गाना के मना रहे है,
अमेरिका चार्लोट नॉर्थ कैरोलिना चैनी पार्क ड्राइव में भारत वासियो व्दारा गणेश चतुर्थी पर दस दिनों तक चलने वाला यह त्यौहार पूरे उत्साह के साथ मनाया जा रहा है।
यंहा पर रहने वाले भारतीयों का कहना है कि गणपति बप्पा विघ्नहर्ता, बुद्धि और समृद्धि के देवता हैं। यह 10 दिनों का उत्सव 27 अगस्त 2025 से शुरू होकर 6 सितंबर को गणेश विसर्जन के साथ समाप्त होगा।
अमेरिका में भारतीय प्रवासी समुदाय के कारण यहां भी इसकी धूम मची हुई है। लगभग 5.4 मिलियन भारतीय-अमेरिकियों की वजह से न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स, शिकागो, ह्यूस्टन, सैन फ्रांसिस्को और न्यू जर्सी जैसे शहरों में मंदिरों, सामुदायिक केंद्रों और घरों में पूजा-अर्चना हो रही है।
जशपुर जिले में पाकरगांव से
निकल कर अमेरिका के चार्लोट नॉर्थ कैरोलिना में रहने वाली गृहणी चन्द्रीका बेहरा का कहना है कि यह त्योहार न केवल धार्मिक है, बल्कि सांस्कृतिक एकता और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक भी बन गया है।
उन्होंने बताया कि यंहा हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS) और अन्य संगठन मंदिरों में विशेष पूजा आयोजित करते हैं।
न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर से लेकर कैलिफोर्निया के बे एरिया तक भव्य पंडाल लगाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, न्यू जर्सी में भव्य गणेश उत्सव होता है, जहां हजारों लोग शामिल होते हैं। शिकागो और लॉस एंजिल्स में सांस्कृतिक कार्यक्रम, नृत्य और संगीत के साथ उत्सव मनाया जाता है।
घरों में पूजा: परिवार छोटी-छोटी मूर्तियां घर लाते हैं, फूलों, लाइट्स और रंगोली से सजाते हैं। प्राण प्रतिष्ठा, षोडशोपचार पूजा और उत्तर पूजा की जाती है। पर्यावरण-अनुकूल मिट्टी की मूर्तियां लोकप्रिय हैं, जिन्हें झीलों या विशेष टैंकों में विसर्जित किया जाता है।
पाकरगांव के ही किसान यदु बेहरा भी इन दिनों अमेरिका प्रवास पर है। यंहा पर गणेश पूजा के दौरान अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि समुदायिक एकता यह त्योहार अनोखा रुप ले चुका है। यह त्यौहार अमेरिकी समुदायों को भी एकजुट करता है।

टेक्सास के इंडिया बाजार में पार्किंग लॉट में पूजा हुई, कंसास या लंदन जैसे स्थानों में भी युवा पीढ़ी नानी के साथ मोदक बनाकर और भजन गाकर हिस्सा ले रही है।
अमेरिका में इको-फ्रेंडली प्रथाओं पर जोर है। मूर्तियों को नदियों या समुद्र में विसर्जित करने के बजाय प्रतीकात्मक तरीके अपनाए जाते हैं, ताकि पर्यावरण को नुकसान न हो।
















