रमेश शर्मा

50 सालों का सफर ख़बरों के साथ...✒️

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हेडलाइन

रायगढ़ के चारों तरफ फैला ‘राखड़’ का साम्राज्य: क्या…सिंडिकेट के साथ रक्षक ही बने भक्षक, क्या नए अफसर तोड़ पाएंगे इस सिंडिकेट का चक्रव्यूह..???

अंकित गोरख की विशेष रिपोर्ट

रायगढ़। संस्कारधानी और औद्योगिक नगरी के रूप में पहचाना जाने वाला रायगढ़ जिला इन दिनों एक भयानक पर्यावरणीय त्रासदी से जूझ रहा है। जिले के चारों दिशाओं में उद्योगपतियों और रसूखदार ‘राखड़ माफियाओं’ ने मिलकर फ्लाई ऐश के गगनचुंबी पहाड़ खड़े कर दिए हैं। नियमों-कायदों को ताक पर रखकर, बिना किसी वैध अनुमति के यत्र-तत्र बिखेरी जा रही यह राख अब लोगों के फेफड़ों में जहर घोल रही है। इस पूरे खेल में सबसे शर्मनाक भूमिका पर्यावरण विभाग के ही कुछ कथित ‘विभीषणों’ की है, जो रक्षक होने का ढोंग रचकर भक्षक की भूमिका निभा रहे हैं।

बड़ा खुलासा: खुद को ‘अधिकारी’ बताने वाला वास्तव में है महज एक ‘कर्मचारी’!!!

इस पूरे महाघोटाले और अवैध उगाही के खेल को लेकर अब एक और सबसे बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक, विभाग में खुद को सर्वेसर्वा और बड़ा ‘अधिकारी’ बताकर धौंस जमाने वाला और अवैध उगाही का मुख्य सूत्रधार कोई अफसर नहीं, बल्कि महज एक ‘कर्मचारी’ है!अपनी ऊंची पहुंच का झूठा रसूख दिखाकर इसने विभाग के भीतर समानांतर सत्ता चला रखी थी। सूत्र बताते हैं कि इस तथाकथित अधिकारी यानी मूल रूप से महज एक कर्मचारी का स्थानांतरण (तबादला) करीब छह माह पहले ही यहाँ से हो चुका है, लेकिन कुर्सी और अवैध कमीशन का मोह ऐसा है कि यह आज भी रायगढ़ छोड़ने को तैयार नहीं है। ऊपर तक मजबूत सांठगांठ का दंभ भरते हुए यह कर्मचारी आज भी यहीं जमा हुआ है और इस पूरे घिनौने खेल का ‘मास्टरमाइंड’ बना हुआ है। ट्रांसफर होने के बावजूद पर्दे के पीछे से पूरा सिंडिकेट यही ऑपरेट कर रहा है..!!!

कागजों पर खेल: 50 हजार टन की NOC, हकीकत में लाखों टन की डंपिंग

इस पूरे सिंडिकेट के भीतर चल रहे गणित का एक और बेहद सनसनीखेज पहलू सामने आया है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, कागजों पर महकमे को दिखाने और वैधानिकता का ढोंग रचने के लिए महज 50,000 टन फ्लाई ऐश डिस्पोजल की अनुमति और एनओसी (NOC) ली जाती है। लेकिन इस सीमित अनुमति की आड़ में डंपिंग साइट्स पर लाखों टन फ्लाई ऐश अवैध रूप से उड़ेल दी जा रही है।
नियमों के इस खुले उल्लंघन से जहां एक ओर शासन को राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है, वहीं दूसरी ओर निर्धारित क्षमता से कई गुना ज्यादा राखड़ पट जाने के कारण आस-पास के पूरे पर्यावरण और जमीन का दम घुट रहा है।

नियमों की धज्जी: किसी भी डंपिंग साइट पर नहीं है कोई सूचना बोर्ड..

पर्यावरणीय नियमों के अनुसार किसी भी फ्लाई ऐश डंपिंग साइट पर संबंधित उद्योग का नाम, अनुमति पत्र क्रमांक, डंपिंग की मात्रा और समय सीमा का पूरा विवरण देने वाला एक आधिकारिक बोर्ड या सूचना पट्टिका लगाना अनिवार्य है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

*चोरी और सीनाजोरी:*

ग्राउंड जीरो से मिल रही जानकारी के अनुसार, रायगढ़ के आस-पास बनाई गई किसी भी राखड़ डंपिंग साइट पर ऐसा कोई भी विवरण, जानकारी बोर्ड या पट्टिका मौजूद नहीं है। माफियाओं ने जानबूझकर इन साइट्स को पूरी तरह ‘अनाम’ और गुप्त रखा है, ताकि 50 हजार की अनुमति के बदले जो लाखों टन अवैध राखड़ डाली जा रही है, उसकी पोल न खुल सके।

बिना अनुमति ‘राखड़’ के पहाड़, कुंभकर्णी नींद में जिम्मेदार…

उद्योगों से निकलने वाली फ्लाई ऐश का निस्तारण नियमों के तहत करने के बजाय, उसे औने-पौने दामों में ठिकाने लगाने का ठेका राखड़ माफियाओं को दे दिया गया है। ये माफिया बिना किसी विभागीय अनुमति के रिहायशी इलाकों के पास, कृषि भूमियों और नदी-नालों के किनारों पर रात के अंधेरे में राखड़ डंप कर रहे हैं। उड़ती धूल से पूरी आबादी त्रस्त है, लेकिन विभागीय रक्षक इस तबाही को देखकर भी गाफिल बैठे हैं।

सिंडिकेट के दरबार में हाजिरी और ‘सत्कार’ का खेल

अंदरखाने से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, इन रसूखदार उद्योगपतियों और बेखौफ माफियाओं का एक मजबूत सिंडिकेट सक्रिय है। इस सिंडिकेट के दरवाजों पर उक्त मास्टरमाइंड कर्मचारी और विभाग के कुछ कतिपय अन्य भ्रष्ट तत्वों की नियमित हाजिरी लगती है। सूत्रों का दावा है कि वहां बकायदा इनका आलीशान सत्कार होता है और इसी ‘सत्कार’ के बदले रायगढ़ की आबोहवा को पूरी तरह तबाह करने की खुली छूट दे दी गई है।

साम-दाम-दंड-भेद से दबाई जाती है आवाज:

जब भी कोई जागरूक नागरिक या पीड़ित ग्रामीण प्रदूषण की शिकायत लेकर विभाग के पास पहुंचता है, तो विभाग में बैठे यही ‘विभीषण’ सक्रिय हो जाते हैं। शिकायतकर्ता की पूरी जानकारी और उसका मोबाइल नंबर तत्काल संबंधित उद्योग या माफिया के गुर्गों तक पहुंचा दिया जाता है। इसके बाद शुरू होता है ‘साम-दाम-दंड-भेद’ का खेल। शिकायतकर्ता को डरा-धमकाकर या लालच देकर उसकी आवाज को दबा दिया जाता है और अंततः शिकायत को उसी राखड़ के ढेर के नीचे दफन कर दिया जाता है।

नए अधिकारी से जागी आस, क्या साफ होगा सिस्टम..??

इस घोर अंधकार के बीच अब जिले की जनता को उम्मीद की एक नई किरण दिखाई दे रही है। विभाग में असली और नए पर्यावरण अधिकारी की पदस्थापना के बाद से आम नागरिकों में यह आस जगी है कि शायद अब उन्हें इस जानलेवा प्रदूषण से राहत मिल सकेगी चूंकि नवपदस्थ पर्यावरण अधिकारी का अधिकांश बचपन यही बीता है और वो यहीं पले बढ़े हैं जिससे उन्हें इस क्षेत्र की पूरी जानकारी होने के कारण उन्हें दिग्भ्रमित करना शायद इन कर्मचारियों के लिए मुश्किल होगा..!!

लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नए पर्यावरण अधिकारी अपने ही विभाग के भीतर पैठ बना चुके इन ‘विभीषणों’ और शायद छह महीने पहले ट्रांसफर हो चुके उस फर्जी ‘मास्टरमाइंड कर्मचारी’ के चंगुल से विभाग को कैसे मुक्त कराते हैं? क्या वे कागजों पर 50 हजार टन दिखाकर हकीकत में लाखों टन राख डंप करने वाले इस सिंडिकेट को तोड़कर रायगढ़ की जनता को साफ हवा में सांस लेने का अधिकार वापस दिला पाएंगे, या फिर यह सिंडिकेट इस बार भी हावी रहेगा…???

जनता की नजरें अब सीधे नए अधिकारी के एक्शन पर टिकी हैं…!!!

हेल्पलाइन के नाम पर बड़ा धोखा: पर्सनल नंबर पर ‘निजी तस्वीरें’ और सन्नाटा!!

इस पूरे तंत्र की लापरवाही और जनता की आंखों में धूल झोंकने का एक और नायाब नमूना सामने आया है। आम जनता को शिकायत करने के लिए विभागीय हेल्पलाइन नंबर के रूप में ‘8319805385’ दिया जाता है। लेकिन जब पीड़ित नागरिक इस नंबर पर संपर्क करने की कोशिश करते हैं, तो वहां से कोई जवाब नहीं मिलता यहाँ तक कि शिकायत करने के बाद उस पर शिकायतकर्ता को संतोषजनक जवाब भी नहीं मिल रहा है।

सवालिया निशान:

जब इस नंबर की पड़ताल की गई, तो पता चला कि यह कोई आधिकारिक या संस्थागत नंबर नहीं, बल्कि पूरी तरह से एक व्यक्तिगत (पर्सनल) नंबर मालूम पड़ता है। अचरज की बात यह है कि यदि यह विभाग का आधिकारिक हेल्पलाइन नंबर है, तो इस पर किसी व्यक्ति की पर्सनल फोटो (निजी तस्वीरें) क्यों लगी हुई हैं? हेल्पलाइन के नाम पर चल रहा यह खेल साफ इशारा करता है कि शिकायत तंत्र को जानबूझकर पंगु बनाया गया है ताकि पीड़ितों की सुनवाई न हो और माफियाओं का धंधा बिना किसी रुकावट के चलता रहे।

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