रमेश शर्मा

50 सालों का सफर ख़बरों के साथ...✒️

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हेडलाइन

“सावधान! कहीं आपकी मेहनत की कमाई पर भी तो नहीं चल रहे फर्जी हस्ताक्षर?” क्या आपकी भी बिना कहे बना दी गई है FD..??

विशेष रिपोर्ट: बैंकिंग में ‘टारगेट’ की सनक या संगठित लापरवाही? चांपा ICICI बैंक मामला खोल रहा है गहरी परतें

“ICICI बैंक चांपा मामला: क्या जूनियर कर्मचारियों की आड़ में बच निकलेंगे बड़े अधिकारी?”

चांपा – बैंकिंग सेक्टर में बढ़ता ‘बिजनेस प्रेशर’ अब ग्राहकों की सुरक्षा के लिए खतरा बनने लगा है। चांपा के आईसीआईसीआई बैंक में 13 लाख की एफडी (FD) के फर्जीवाड़े ने यह बहस छेड़ दी है कि… क्या इसके लिए सिर्फ नए और जूनियर कर्मचारी ही जिम्मेदार हैं? या फिर पर्दे के पीछे बैठे वो ‘बड़े साहब’ भी कसूरवार हैं, जो बंद कमरों में बैठकर टारगेट का ऐसा दबाव बनाते हैं कि नियम-कायदे बौने पड़ जाते हैं..!!!

जूनियर सिर्फ चेहरा, असली चूक ‘सिस्टम’ की..!!

बैंकिंग विशेषज्ञों का तर्क है कि कोई भी जूनियर कर्मचारी अकेले इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकता। बैंक के अंदर हर फाइल ‘चेकर और मेकर’ की प्रक्रिया से गुजरती है। अगर हस्ताक्षर फर्जी थे….तो क्या ब्रांच मैनेजर या ऑपरेशन हेड की आंखों ने इसे नहीं देखा? या फिर महीने का टारगेट पूरा करने की होड़ में जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?

रीजनल और क्लस्टर हेड की चुप्पी पर सवाल..!!

जब बैंक को मुनाफा होता है, तो उसका श्रेय रीजनल और क्लस्टर हेड ले जाते हैं, लेकिन जब कोई बड़ा घोटाला या चूक सामने आती है, तो सारा दोष ‘स्टाफ की व्यक्तिगत गलती’ बताकर जूनियर को बलि का बकरा बना दिया जाता है।

सवाल 1: क्या सीनियर अधिकारियों को पता नहीं कि टारगेट पूरा करने के लिए नीचे किस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं?

सवाल 2: क्या क्लस्टर हेड केवल ‘नंबरों’ की निगरानी करते हैं, ‘प्रक्रिया’ की नहीं?

जवाबदेही का नया मॉडल जरूरी…!!

इस मामले में केवल एक क्लर्क या कैशियर को सस्पेंड करना समाधान नहीं है। जब तक शाखा प्रबंधक (BM) और क्षेत्रीय प्रबंधकों (RH/CH) पर विभागीय कार्यवाही नहीं होगी, तब तक बैंकिंग सिस्टम में ‘जवाबदेही’ (Accountability) शब्द केवल कागजों तक सीमित रहेगा।

ग्राहकों का टूटता भरोसा

यदि बैंक के भीतर ही ग्राहकों के हस्ताक्षरों के साथ खिलवाड़ हो रहा है, तो आम आदमी अपनी जमा पूंजी कहाँ सुरक्षित रखे? यह मामला अब केवल एक बैंक का नहीं, बल्कि पूरे बैंकिंग प्रशासन की नैतिकता का है। प्रशासन और बैंकिंग लोकपाल को चाहिए कि इस बार जांच की आंच ऊपर बैठे अधिकारियों तक भी पहुंचे।

और अंत में…

“बैंकिंग भरोसे का व्यापार है, टारगेट का शिकार नहीं।

उच्च अधिकारियों की जवाबदेही तय होना समय की मांग है।”

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