रमेश शर्मा

50 सालों का सफर ख़बरों के साथ...✒️

रमेश शर्मा

50 सालों का सफर ख़बरों के साथ...✒️

Edit Template
हेडलाइन

पर्यावरण दफ्तर में बैठकर ‘कागजी कार्रवाई’ का खेल: बिना जांच और मौका मुआयना किए उद्योगों को नोटिस-जुर्माना थमाना कहां तक न्यायसंगत..??

रायगढ़ – शहर में फ्लाई ऐश (राखड़) के अवैध पहाड़ों को लेकर मचे बवाल के बाद अब पर्यावरण विभाग का एक नया पैंतरा सामने आ रहा है। खुद को कार्रवाई करता हुआ दिखाने के लिए विभाग ने कुछ उद्योगों को नोटिस थमाने या मामूली जुर्माना लगाने की सुगबुगाहट शुरू की है। लेकिन सवाल यह उठता है कि बिना डंपिंग साइट पर जाए, बिना जमीनी हकीकत का मुआयना किए और बिना वैज्ञानिक नाप-जोख किए, दफ्तर के बंद कमरों में बैठकर यह नोटिस और जुर्माना तय करना कहां तक न्यायसंगत है…??

क्या यह महज एक कागजी खानापूर्ति है ताकि ऊपरी अधिकारियों और मीडिया को यह दिखाया जा सके कि ‘कार्रवाई हो रही है’? या फिर इसके पीछे उद्योगों को बचाने की कोई बड़ी प्रशासनिक सांठगांठ है..???

बिना मौका मुआयना ‘जुर्माना’ तय कैसे हुआ..??..!!

पर्यावरणीय नियमों के मुताबिक, जब भी कहीं अवैध डंपिंग की शिकायत होती है, तो विभाग की तकनीकी टीम को मौके पर जाकर निम्नलिखित जांच करनी होती है:

मात्रा का आकलन: डंपिंग साइट पर कुल कितने लाख टन राखड़ डाली गई है, इसका सटीक माप (Measurement)।

जमीन की प्रकृति: क्या वह कृषि भूमि है, सरकारी जमीन है या नदी-नालों का कैचमेंट एरिया (जलग्रहण क्षेत्र) है?

पर्यावरणीय क्षति: आस-पास के जल स्रोतों और वायु गुणवत्ता (Air Quality) को कितना नुकसान पहुंचा है?

जब विभाग के अधिकारी और वे ‘विभीषण कर्मचारी’ मौके पर गए ही नहीं, तो उन्होंने यह कैसे तय कर लिया कि उल्लंघन कितना बड़ा है? बिना भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के जारी किया गया कोई भी नोटिस या जुर्माना कानूनी रूप से इतना कमजोर होता है कि उद्योग उसे कोर्ट या ट्रिब्यूनल में एक झटके में खारिज करवा देते हैं। साफ है कि यह उद्योगों को कानूनी रूप से ‘सेफ पैसेज’ (सुरक्षित रास्ता) देने की सोची-समझी रणनीति है।

मीडिया से दूरी:

अगर विभागीय अधिकारी अमले के साथ मौके पर मुआयना कर कार्यवाही करते हैं तो मीडिया को इसकी सूचना क्यों नहीं दी जाती है..??मीडिया से दूरी बनाकर गुपचुप कार्यवाही करना भी स्वयं संदेह के घेरे में आता है…???

50 हजार बनाम लाखों टन: कागजी पेनल्टी का मज़ाक..??

जैसा कि पहले ही खुलासा हो चुका है कि उद्योग 50 हजार टन की परमिशन लेकर लाखों टन राखड़ डंप कर रहे हैं। ऐसे में अगर विभाग दफ्तर में बैठकर केवल 50 हजार टन के आधार पर कोई मामूली जुर्माना लगाता है, तो यह पर्यावरण के साथ भद्दा मजाक है।

लाखों की कमाई, कौड़ियों का जुर्माना:

उद्योगपति अवैध डंपिंग के जरिए करोड़ों रुपए बचा रहे हैं। उन पर बिना मौके पर जाए कुछ हजार या लाख रुपयों का टोकन जुर्माना लगा देना, दरअसल उन्हें अवैध काम जारी रखने का ‘ऑफिशियल लाइसेंस’ देने जैसा है। उद्योगपति हंसते-हंसते यह जुर्माना भर देते हैं और उनका काला कारोबार बदस्तूर जारी रहता है।

नए अधिकारी के सामने साख का संकट: ‘दफ्तर’ से निकलेगा अमला या सिंडिकेट रहेगा हावी??..!!!

जनता अब इस ‘कागजी खेल’ को अच्छी तरह समझ चुकी है। नए पर्यावरण अधिकारी के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। न्यायसंगत कार्रवाई तब मानी जाएगी जब विभाग की टीम पुलिस और राजस्व अमले के साथ खुद मौके पर उतरे, डंपिंग साइट की जीपीएस मैपिंग (GPS Mapping) करे, वास्तविक मात्रा का पंचनामा बनाए और दोषी उद्योगों के साथ-साथ उस जमीन पर अवैध काम कराने वाले ‘राखड़ माफिया’ पर सीधे एफआईआर (FIR) दर्ज कराए।

अगर ऐसा नहीं होता है, तो बंद कमरों से जारी होने वाले ये नोटिस सिर्फ इस बात का सबूत बनकर रह जाएंगे कि वह ‘मास्टरमाइंड कर्मचारी’ और उसका सिंडिकेट आज भी विभाग की कलम को अपने हिसाब से चला रहा है…???

सूत्रों के अनुसार जिसका संभवतः तबादला हो चुका है..???

Advertisement

error: Content is protected !!